पराये

डॉ लाल रत्नाकर
कैसे कैसे दुखी हो रहे हैं ये बावले !
ये तो किस्मत का खेल है सांवले !!

जन्म से मृत्यु तक तो ही जीवन भी है
किस जहां की उधेड़ बुन में है बावले !

उनकी हिम्मत में है जो कसाई की कला
ऐसे ऐसे तोहमत को कैसे सम्भाले हुए हैं

आग है पर वहां वो जो दिखती नहीं
राख के भ्रम में उसको छुपाए हुए हैं।

मुंह खुला तो जहर भी निकल जाएगा
वो ताला लगाए हुए भी निगल जाएगा !!

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