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सोमवार, 27 जून 2016




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वतन

वतन वतन ही होता है जहाँ जन्म से लेकर नित नए बदलाव जोड़ते रहते हैं हमें, माँ को माटी को और वहां कि हवा को फिर भी मन नहीं भरता.
जबकि हम 'वसुधैवकुटुम्बकम' कि बात करते तो हैं पर अपने पडोसी को भी चैन से जीने ही नहीं देते हैं. यही है वतन कि खूबियाँ काश हम उसे आदर्श बना पाते, बराबरी और त्याग को अपने 'आदर्श' के रूप में
रखते लेकिन आज ये सारी बातें केवल और केवल कहने की होकर रह गयी हैं.

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